इंसानियत का हक अदा कर रही अंजुमन

बगैर सार्वजनिक प्रचार-प्रसार के गरीबों तक पहुंचा रही निवाला

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अंजुमन खिदमत ए खल्क की मुहीम को मिल रही दुआएं
शामली। गरीब की भी अपनी इज्जत होती है, इसी के चलते कई परिवार वक्त की रंजिशों से जूझने के बावजूद भी समाज के सामने हाथ फैलाना मुनासिब नही समझते, क्योंकि उनका जमीर इसकी गवाही नही देता। कई बार लोग गरीबों की मद्द करने के बाद प्रशंसा पाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। इतना ही नही कई सामाजिक संस्थाएं और एनजीओ भी कई बड़े आयोजन कर गरीबों की मद्द करते हैं, ताकि उनके कार्य मीडिया की सुर्खिया बन सकें, लेकिन इन सबसे बचते हुए अंजुमन खिदमते खल्क ने गरीब परिवारों की मद्द के लिए नया रास्ता अख्तियार किया है। इससे अंजुमन को भले ही सार्वजनिक तौर पर प्रशंसा न मिल रही हो, लेकिन इज्जत की जिंदगी जीने की चाह रखने वाले गरीब परिवारों की दुआएं उन तक जरूर पहुंच रही हैं।
कैराना में सामाजिक संस्था अंजुमन खिदमत-ए-खल्क समाज के हर वर्ग के दुबे-कुचले लोगों की मदद कर रही है। पवित्र रमजान-उल-मुबारक के महीने में अंजुमन की ओर से 70 से अधिक निर्धन एवं असहाय परिवारों को पूरे महीने के लिए राशन किट तकसीम की गई थी। दो दिन पूर्व दंगा विस्थापित नाहिद कॉलोनी में अंजुमन ने करीब 70 परिवारों को ईद की खुशियों में शामिल करने के लिए सूट वितरित किए। बाकायदा उनकी सिलाई का खर्च भी अंजुमन ने खुद ही उठाने की जिम्मेदारी ली है। प्रत्येक परिवार को 500-500 रूपये आर्थिक मदद के तौर पर दिए गए। अंजुमन के सदर हाजी नसीम मंसूरी ने बताया कि उनका इमदाद करने का तौर-तरीका सुन्नती है। इस्लाम मजहब में कहा गया है कि बेशक मदद करो, लेकिन किसी को रूसवा मत करो और एक हाथ से दो तो दूसरे को खबर भी न लगें। इस पर अमल करते हुए ही अंजुमन गरीबों की मदद कर रही है। अंजुमन का असल मकसद खिदमत-ए-खल्क है, नाकि किसी को रूसवा करना। इसीलिए वे सार्वजनिक तौर पर किसी की मदद नहीं करते हैं। गरीब व असहाय परिवारों को पर्ची दे दी जाती है, उन्हें जितने राशन की जरूरत होती है, दुकान से खुद जाकर ले ले लेते हैं। हाजी नसीम मंसूरी का कहना है कि समाजसेवा से बढ़कर कोई बड़ा पूण्य नहीं है। किसी की मदद को दिल को सुकून मिलता है।

240 बच्चों को पढ़ा रही अंजुमन
अंजुमन गरीब कन्याओं की शादी और असहाय बच्चों के भविष्य को लेकर भी चिंतित है। अंजुमन सदर हाजी नसीम मंसूरी बताते हैं कि ऐसे 240 बच्चे हैं, जो दीनी मदरसों और विभिन्न स्कूल-कॉलेजों में पढ़ रहे हैं। पिछले दिनों एक दंगा विस्थापित बच्चे ने इंटरमीडिएट में एसएन इंटर कॉलेज टॉप किया था। समय-समय पर गरीब कन्याओं की शादी में भी अंजुमन सहयोग करती रही है।

हिंदू-मुस्लिम दोनों की खिदमत
ऐसी सामाजिक संस्था या फिर एनजीओ कम ही नजर आती हैं, जो निस्वार्थ भाव से गरीबों की मदद करती है। उन्हीं में से अंजुमन खिदमत-ए-खल्क भी हैं। अंजुमन के सदर का कहना है कि इंसानियत के नाते वे केवल मुस्लिम ही नहीं, बल्कि हिंदुओं की भी समय-समय पर मदद करते है। मदद से पहले अंजुमन के सदस्यों की ओर से गोपनीय रूप से संबंधित परिवार की सत्यता की भी जांच की जाती है और फिर इम्दाद।

अंजुमन के सदस्य उठाते हैं खर्च
अंजुमन में लगभग 500 सदस्य हैं। प्रत्येक सदस्य 100-100 रूपये अंजुमन में एकत्र करते हैं। वह कहते हैं कि समाजसेवा बड़ा पूण्य का कार्य है। इसलिए लोगों को इससे जुड़ना चाहिए। अंजुमन की यदि कोई खिदमत करना चाहता है, तो वो जोड़वा कुआं स्थित मियां सुनार वाली गली में अंजुमन से संपर्क कर सकते हैं और गरीबों की मदद में हिस्सा ले सकते हैं।

दंगे के बाद आया खिदमत का ख्याल
अंजुमन के सदर हाजी नसीम मंसूरी ने बताया कि सांप्रदायिक दंगे के बाद उनके दिल में गरीबों की खिदमत करने का ख्याल आया। इसके बाद 2015 में उन्होंने अंजुमन का रजिस्ट्रेशन कराया। उनका कहना है कि इंसानियत ही उनके लिए सबसे बड़ी चीज है। इसलिए वे मदद करने में ये नहीं देखते हैं कि संबंधित व्यक्ति किस जाति या मजहब है। उनका उद्देश्य केवल खिदमत है।

फोटो परिचय- हाजी नसीम मंसूरी

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