समाज को बेटी से तकलीफ क्यों ?

क्या मां की जिंदगी से बड़ी है बेटा पैदा करने की चाहत...

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क्या हम किसी मां के बेटे नही हैं..? क्या हम किसी बहन के भाई नही है..? क्या समाज में बेटियों के बगैर कोई बाप होने का गर्व हासिल कर सकता है..? अगर जवाब नही है, तो यें सब बात हम उस समय क्यों भूल जाते हैं, जब एक मां बेटी को जन्म देती है..?बेटी ब्याहने के बाद दूसरों का वंश चलाने के लिए अपनी जान पर खेल जाती है..हमारे जेहन में कब यह बात बैठेगी कि बच्चा पैदा करने के दौरान महिला का दूसरा जन्म होता है.. इसके बावजूद भी वह खुद के लिए नही बल्कि दूसरों की महत्वाकांक्षा पूरा करने के लिए मौत से भी टकरा जाती है.. शर्मिंदी की बात यह है कि ऐसा हौसला मर्दों की सोच से भी दूर है। बात इतने से ही खत्म नही होती…यदि बेटी हुई, तो क्यों महिला को ताने दिए जाते है..बेटे की चाहत रखने समाज और परिवार क्यों उसे इतना परेशान कर देते हैं कि वह खुद को गुनहगार समझ लेती है…इन्हीं सवालों के साथ हम आज आपके सामने रख रहे हैं…विशेष रिपोर्ट…

शामली में पेश आई शर्मनाक घटना—
हिंद न्यूज टुडे की टीम एक हंगामें की कवरेज के लिए शामली के सरकारी अस्पताल पहुंची थी. अस्पताल के एक वार्ड में प्रसव के बाद एक महिला असहनीय पीड़ा से लड़कर बेहोशी के हालातों से जूझ रही थी… महिला ने एक बच्ची को जन्म दिया था। डॉक्टरों से औपचारिक प्रमीशन के बाद हम बच्ची को देखने की चाहत रखते हुए अस्पताल के वार्ड में गए। हमने पूछा कि क्या यह वही बच्ची है, तो एक महिला स्वास्थ्य कर्मचारी ने जवाब दिया यह बच्ची हमारी है…जवाब अटपटा जरूर था, जिसने हमें मानवीय रूप से प्रताडित किया..इसी बीच उधर से दूसरा जवाब भी मिल गया…कहा गया है कि बच्ची पैदा हुई है, लेकिन परिवार के लोग उसे दुलारने के बजाय बाहर डाक्टरों से बेटे की मांग करते हुए हंगामा काट रहे हैं..उनका दावा है कि महिला को बेटी नही बेटा हुआ है, जिसे अस्पताल स्टॉफ ने बदल दिया है…उन्हें बेटी नही बेटा ही चाहिए…

क्यों अकेली रह गई नन्ही बिटिया…
हमने नवजात बेटी की तरफ नजर घुमाई, तो उसे देखने के बाद लगा कि ‘यह मुमकिन ही नहीं है कि इससे प्यार न हो जाए, ये बहुत खूबसूरत है’। जिस वक़्त हम लोग वहां खड़े-खड़े बातें कर रहे थे, बच्ची ने रोना शुरू कर दिया। उसे भूख लग रही है… वह अपनी मुट्ठी बंद कर अंगुलियां चूस रही थी। वह शायद इसलिए रो रही थी कि कमरे में मौजूद अन्य बच्चों को उनके मां—बाप का दुलार मिल रहा था, लेकिन उसके लिए यह शर्मनाक बात थी कि परिवार के लोग बाहर खड़े होकर उसके बजाय डाक्टरों से बेटे की डिमांड कर रहे थे।

 

किस बात का न्याय मांग रहे थे परिवार के लोग ?
हमने जब बाहर हंगामा कर रहे परिजनों से बात की, तो उन्होंने बताया कि उन्हें अस्पताल के एक स्टॉफ द्वारा बेटा होने की जानकारी दी गई थी, लेकिन बाद में उन्हें बेटी थमा दी गई। उन्होंने हमसे भी न्याय दिलाने की मांग की। दावों की पड़ताल करने के लिए जब हमने छानबीन की, तो पता चला कि यह परिवार के लोगों का भ्रम था, क्योंकि उस दौरान कोई अन्य डिलीवरी नही हुई थी, उससे पहले सिर्फ तीन बच्चे हुए थे, जिनमें से एक लड़का भी था, जिसे उसके परिवार के लोग दुलार रहे थे।

 

बेटियां नही रही, तो क्या जिंदा रह पाओगे
शामली ही नही पूरे भारत में बेटियों के मुक़ाबले बेटे की ज़्यादा इच्छा देखी जाती है। लोग मानते हैं कि बेटा ही ख़ानदान के नाम को आगे बढ़ाएगा और वो बुढ़ापे में मां-बाप का सहारा बनेगा, जबकि बेटी के लिए उन्हें दहेज़ देना पड़ेगा और फिर वह अपने ससुराल चली जाएगी। बेटियों को लेकर इसी भेदभाव की वजह से भारत में बड़े पैमाने पर कन्या भ्रूण हत्या और नवजात बेटियों की हत्या होती है जिसकी वजह से भारत में लिंग अनुपात का संतुलन बुरी तरह से बिगड़ गया है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़ भारत में एक हज़ार लड़कों के मुक़ाबले 927 लड़कियों का जन्म होता है, जबकि इसी साल जारी किए गए नए आंकड़े के मुताबिक़ यह तादाद लगातार गंभीर स्तर तक गिरती जा रही है।डा. चंद्रा ने कहा गलतफहमी हुई..
मामले के संबंध में जब सीएचसी शामली के प्रभारी चिकित्सक डा. रमेश चंद्रा से बात की गई, तो उन्होंने बताया कि परिजनों को संभवत: गलतफहमी हुई होगी, जिसके चलते उनके द्वारा इतना गंभीर और बेबुनियाद आरोप लगाया गया। अस्पताल का रिकार्ड समय दर समय सुरक्षित किया जाता है, यदि पीडित पक्ष द्वारा शिकायत की जाती है, तो हम ब्लड से संबंधित डीएनए टेस्ट के लिए भी तैयार हैं।

 

सीएमओ बोले…विभाग से नही हुई कोई गलती
जब उपरोक्त मामले के संबंध में हिंद न्यूज टुडे द्वारा सीएमओ संजय भटनागर से वार्ता की गई, तो उन्होंने बताया कि विभाग द्वारा कोई गलती नही हुई है.. गलती यह है कि लोग बेटे की चाहत में पहले से ही सपने बुनने लगते हैं.. इसके लिए गर्भ ठहरने से पहले ही कवायदें शुरू हो जाती है, ताकि बेटा ही पैदा हो। उन्होंने बताया कि कई बार बेटे की चाहत में लोग अल्ट्रासाउण्ड के दोरान ही डाक्टरों को लिंग जांच के लिए रकम का लालच दे देते है, लेकिन जो डाक्टर समझदार होते हैं, वें उन्हें सही जानकारी नही देते, ऐसे हालातों में भी लोग बेटे के सपने देखने लग जाते हैं।

 

हिंद टुडे की प्रति​क्रिया…
आज समाज में बेटियों की उपेक्षाएं देखने को मिल रही हैं। इक्कीसवीं सदी में भी लोग बेटे और बेटी में भेदभाव रखते है, बेटे को वंश बढ़ाने वाला मानते है लेकिन बेटी को बेटे जैसा प्यार तक नही मिल पाता..समाज की वर्तमान की सच्चाई यह भी है कि लोग जिसे वंश बढ़ाने वाला आंखों का तारा मानते हैं, वह अपने मां—बाप को ही धक्के मारकर घर से निकाल देता है…और लड़कियां दिनभर घर का सारा काम करती है..शादी के बाद दूसरे परिवार का मान भी बढ़ाती है, उन्हें पैदा होने पर घृणा की नजरों से देखा जाता है। आज समाज को बेटियों से जुड़े हालातों पर गंभीर चिंतन की जरूरत है।
— एडिटर इन चीफ: पंकज वालिया, हिंद टुडे न्यूज

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